वैष्णवी भोजपुरी सिनेमा की सबसे कम उम्र की हीरोइन हैं मगर समझदारी के मामले में बहुत आगे हैं। यह अलग बात है कि उनका भी ध्यान आजकल सबसे ज्यादा हिंदी सिनेमा की तरफ है, लेकिन भोजपुरी भी कर रही हैं। भोजपुरी के शेक्सपीयर माने जाने वाले भिखारी ठाकुर को लेकर काफी भावुक हैं और चाहती हैं कि उन्हें कम से कम बिहार में उचित सम्मान तो दिलाया जाये
अभी तो आपने दसवीं की परीक्षा पास की है, पढ़ाई-लिखाई की उम्र में एक्टिंग के पीछे भागने की जल्दबाजी क्यों? शायद यही मेरे जीवन का संयोग है। मेरे मां-बाप ने भी हर मां-बाप की तरह मेरे जन्म के बाद सोचा होगा कि बड़ी होकर कुछ बन जाऊं या फिर किसी अच्छे घर में मेरी शादी हो जाये जहां सुख की जिंदगी हो। लेकिन कब किसके भाग्य में क्या मिलेगा, किसी को पता नहीं होता है। मैं तीन साल की थी तब ही फिल्मी गानों पर थिरकने लगी थी और लोग मेरे डांस को हैरानी से देखा करते। लेकिन मेरे पिता को उसमें मेरी प्रतिभा की झलक दिखाई दे गयी। तभी उन्होंने तय कर लिया था कि वे मुझपर कोई अंकुश नहीं लगायेंगे, जिसमें मेरी दिलचस्पी होगी उसमें आगे बढ़ाने में मदद करेंगे। डांस का ही कमाल था कि बाद में मुझे स्टेज शो मिलने लगे और मेरे हिस्से दो दर्जन से भी ज्यादा अलबम आये। उसी ने फिल्मों में आने का रास्ता दिया। पढ़ाई और एक्टिंग साथ-साथ चल रही है। मैं रहने वाली सारण की हूं लेकिन पढ़ाई बनारस में हो रही है। आपने कई भोजपुरी फिल्मों में काम किया लेकिन सुना है कि हिंदी में अपना करियर बनाने की चाहत है? मेरी अपनी भाषा भोजपुरी है, उससे दूर जाने का कभी ख्याल भी नहीं आया है। अभी तक पांच फिल्मों में काम किया है ‘‘जय मैया अंबे भवानी’, ‘‘बीए पास बहुरिया’, ‘‘हमार देवदास’, ‘‘मैं नागिन तू नगीना’ और ‘‘जीना तेरी गली में’ रिलीज हो चुकी है। आगे भी कई फिल्मों के लिये बात हुई है लेकिन इसी बीच लगा कि हिंदी में भी खुद को आजमाना चाहिये। निर्माता रंजू सिन्हा, शशिभूषण, जेके पांडे तथा दिलीप जैसवाल की फिल्में लगभग फाइनल हो चुकी हैं। ये सारी मीडियम बजट की फिल्में होंगी लेकिन तसल्ली है कि हिंदी में कदम रख रही हूं। यह जानती हूं कि हिंदी में संघर्ष बहुत है लेकिन उस चुनौती को स्वीकार करना मेरे लिये जरूरी भी है। इसलिये भी कि भोजपुरी एक्टरों को हिंदी में हमेशा उपेक्षा के साथ देखा जाता है। हम सबके सामने यह साबित करने की जिम्मेदारी है कि हम भी एक्टर ही हैं।जिम्मेदारी तो आप लोगों की यह भी है कि भोजपुरी के शेक्सपीयर कहे जाने वाले भिखारी ठाकुर को उपेक्षा से बचायें! अगर असम की भोजपुरी गायिका कल्पना को छोड़ दें तो कोई भी इस दिशा में सक्रिय नजर नहीं आ रहे हैं? भोजपुरी एक्टरों में शायद मैं अकेली हूं जो पिछले कई वर्षो से भिखारी ठाकुर को सम्मान दिलाने के लिये संघर्ष कर रही हूं। लगातार सरकार, मंत्रियों और अधिकारियों से मिल रही हूं। जगह-जगह भिखारी ठाकुर की प्रतिमा लगवाने की कोशिश में हूं। मुझे तो लगता है कि राजनीतिक दलों का ध्यान इस तरफ इसलिये नहीं है कि भिखारी ठाकुर वोट बैंक का जुगाड़ नहीं कर सकते। मुझे बार-बार लगता है कि भिखारी ठाकुर अगर किसी और प्रदेश में पैदा हुए होते तो आज वहां की शान रहते। लगता तो यह भी है कि पिछड़े समाज के होने का भी खामियाजा उन्हें भुगतना पड़ रहा है। क्या यह हैरानी की बात नहीं है कि 25 करोड़ लोगों की भाषा अभी तक संविधान की आठवीं सूची में शामिल नहीं हो पायी है।
अभी तो आपने दसवीं की परीक्षा पास की है, पढ़ाई-लिखाई की उम्र में एक्टिंग के पीछे भागने की जल्दबाजी क्यों? शायद यही मेरे जीवन का संयोग है। मेरे मां-बाप ने भी हर मां-बाप की तरह मेरे जन्म के बाद सोचा होगा कि बड़ी होकर कुछ बन जाऊं या फिर किसी अच्छे घर में मेरी शादी हो जाये जहां सुख की जिंदगी हो। लेकिन कब किसके भाग्य में क्या मिलेगा, किसी को पता नहीं होता है। मैं तीन साल की थी तब ही फिल्मी गानों पर थिरकने लगी थी और लोग मेरे डांस को हैरानी से देखा करते। लेकिन मेरे पिता को उसमें मेरी प्रतिभा की झलक दिखाई दे गयी। तभी उन्होंने तय कर लिया था कि वे मुझपर कोई अंकुश नहीं लगायेंगे, जिसमें मेरी दिलचस्पी होगी उसमें आगे बढ़ाने में मदद करेंगे। डांस का ही कमाल था कि बाद में मुझे स्टेज शो मिलने लगे और मेरे हिस्से दो दर्जन से भी ज्यादा अलबम आये। उसी ने फिल्मों में आने का रास्ता दिया। पढ़ाई और एक्टिंग साथ-साथ चल रही है। मैं रहने वाली सारण की हूं लेकिन पढ़ाई बनारस में हो रही है। आपने कई भोजपुरी फिल्मों में काम किया लेकिन सुना है कि हिंदी में अपना करियर बनाने की चाहत है? मेरी अपनी भाषा भोजपुरी है, उससे दूर जाने का कभी ख्याल भी नहीं आया है। अभी तक पांच फिल्मों में काम किया है ‘‘जय मैया अंबे भवानी’, ‘‘बीए पास बहुरिया’, ‘‘हमार देवदास’, ‘‘मैं नागिन तू नगीना’ और ‘‘जीना तेरी गली में’ रिलीज हो चुकी है। आगे भी कई फिल्मों के लिये बात हुई है लेकिन इसी बीच लगा कि हिंदी में भी खुद को आजमाना चाहिये। निर्माता रंजू सिन्हा, शशिभूषण, जेके पांडे तथा दिलीप जैसवाल की फिल्में लगभग फाइनल हो चुकी हैं। ये सारी मीडियम बजट की फिल्में होंगी लेकिन तसल्ली है कि हिंदी में कदम रख रही हूं। यह जानती हूं कि हिंदी में संघर्ष बहुत है लेकिन उस चुनौती को स्वीकार करना मेरे लिये जरूरी भी है। इसलिये भी कि भोजपुरी एक्टरों को हिंदी में हमेशा उपेक्षा के साथ देखा जाता है। हम सबके सामने यह साबित करने की जिम्मेदारी है कि हम भी एक्टर ही हैं।जिम्मेदारी तो आप लोगों की यह भी है कि भोजपुरी के शेक्सपीयर कहे जाने वाले भिखारी ठाकुर को उपेक्षा से बचायें! अगर असम की भोजपुरी गायिका कल्पना को छोड़ दें तो कोई भी इस दिशा में सक्रिय नजर नहीं आ रहे हैं? भोजपुरी एक्टरों में शायद मैं अकेली हूं जो पिछले कई वर्षो से भिखारी ठाकुर को सम्मान दिलाने के लिये संघर्ष कर रही हूं। लगातार सरकार, मंत्रियों और अधिकारियों से मिल रही हूं। जगह-जगह भिखारी ठाकुर की प्रतिमा लगवाने की कोशिश में हूं। मुझे तो लगता है कि राजनीतिक दलों का ध्यान इस तरफ इसलिये नहीं है कि भिखारी ठाकुर वोट बैंक का जुगाड़ नहीं कर सकते। मुझे बार-बार लगता है कि भिखारी ठाकुर अगर किसी और प्रदेश में पैदा हुए होते तो आज वहां की शान रहते। लगता तो यह भी है कि पिछड़े समाज के होने का भी खामियाजा उन्हें भुगतना पड़ रहा है। क्या यह हैरानी की बात नहीं है कि 25 करोड़ लोगों की भाषा अभी तक संविधान की आठवीं सूची में शामिल नहीं हो पायी है।





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